बुद्धि से बड़ा बल हो रहा -2025
Might Crushes Mind

भारत एक अजीब मोड़ पर खड़ा है। जिस देश ने चाणक्य की नीति, अकबर की सूझबूझ और गांधी के अहिंसक प्रतिरोध को जन्म दिया, वह आज मांसपेशियों (बल) की पूजा में व्यस्त है। 2025 में हम एक ऐसे युग में जी रहे हैं जहाँ बुद्धि की जगह बाहुबल ने ले ली है, जहाँ तर्क की जगह हिंसा का प्रदर्शन होता है।
यह बदलाव अचानक नहीं हुआ। यह एक धीमी, लगातार प्रक्रिया है जिसमें सिनेमा, सोशल मीडिया और हमारी सामूहिक मानसिकता ने मिलकर काम किया है। आइए समझें कि कैसे बुद्धि हमारी सामाजिक प्राथमिकताओं की सूची में नीचे खिसक गई।
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सिनेमा का बदलता चेहरा
पिछले दशक में भारतीय सिनेमा ने एक स्पष्ट बदलाव देखा है। जहाँ पहले नायक अपनी चतुराई और योजनाओं से खलनायक को परास्त करता था, वहीं अब वह केवल अपनी शारीरिक शक्ति से सबको रौंद देता है।

बाहुबली ने यह ट्रेंड शुरू किया। अमरेंद्र बाहुबली का चरित्र निस्संदेह प्रभावशाली था, लेकिन उसकी सबसे बड़ी उपलब्धियाँ उसकी बुद्धि से नहीं, बल्कि उसकी अलौकिक शारीरिक क्षमता से आती थीं। शिवलिंग उठाना, झरने के विपरीत चढ़ना, अकेले ही सेनाओं को धूल चटाना – यह सब दर्शकों को एक संदेश देता है: ताकत ही सब कुछ है।
KGF ने इसे और आगे बढ़ाया। रॉकी भाई का चरित्र पूरी तरह से हिंसा और आक्रामकता पर आधारित है। उसकी समस्याओं का समाधान हमेशा एक ही है – मुक्कों और गोलियों से। फिल्म में बौद्धिक द्वंद्व, नैतिक दुविधा या सूझबूझ की कोई जगह नहीं है।
पुष्पा ने इस फॉर्मूले को परिपूर्ण किया। “झुकेगा नहीं” का डायलॉग सिर्फ एक फिल्मी संवाद नहीं रहा, यह एक सामाजिक घोषणा बन गया। लेकिन इस घोषणा में कोई बुद्धिमत्ता नहीं, केवल अहंकार और आक्रामकता है।
सोशल मीडिया: बुद्धि का श्मशान

सोशल मीडिया ने इस समस्या को और गहरा किया है। आज के युग में सबसे ज्यादा वायरल वही होता है जो सबसे तेज, सबसे आक्रामक और सबसे कम सोचा-समझा होता है।
इंस्टाग्राम रील्स और यूट्यूब शॉर्ट्स पर जिम में कसरत करते हुए युवकों की वीडियो लाखों व्यूज पाती हैं, जबकि गहन विश्लेषण वाले वीडियो अनदेखे रह जाते हैं। क्यों? क्योंकि मांसपेशियाँ दिखाई देती हैं, विचार नहीं।
ट्विटर (अब X) पर सबसे ज्यादा एंगेजमेंट उन पोस्ट्स को मिलती है जो किसी को गाली देते हैं, किसी का अपमान करते हैं या किसी के खिलाफ आक्रामक भाषा का प्रयोग करते हैं। संतुलित, विचारशील राय को “कमजोर” माना जाता है।
यह सिर्फ मनोरंजन नहीं है – यह हमारे समाज की नई व्याकरण है। जो जोर से चिल्लाए, वह सही। जो मारे, वह हीरो।

शिक्षा प्रणाली की विफलता
हमारी शिक्षा प्रणाली को इस बदलाव को रोकना चाहिए था, लेकिन यह खुद ही विफल हो गई है। आज के स्कूल और कॉलेज रटने की मशीनें बन गए हैं, सोचने के केंद्र नहीं।
एक इंजीनियरिंग स्नातक को जटिल समीकरण याद हो सकते हैं, लेकिन वह सड़क पर किसी से विनम्रता से बात नहीं कर सकता। एक MBA डिग्रीधारी को मार्केटिंग की सारी तकनीकें आती हैं, लेकिग वह सोशल मीडिया पर उसी आक्रामक भाषा का प्रयोग करता है जो एक अशिक्षित व्यक्ति करता है।
शिक्षा केवल जानकारी देने तक सीमित रह गई है। यह चरित्र नहीं बनाती, विवेक नहीं सिखाती, संयम नहीं सिखाती। परिणामस्वरूप, हमारे पास शिक्षित गुंडों की एक पीढ़ी है।
तत्काल संतुष्टि की संस्कृति
आधुनिक जीवन तत्काल परिणामों पर आधारित है। दस मिनट में खाना डिलीवर हो, दो दिन में सामान आ जाए, एक क्लिक में पैसा ट्रांसफर हो जाए। इस तीव्रता में धैर्य और विचार के लिए कोई जगह नहीं है।
बुद्धि को समय चाहिए। एक समस्या का बुद्धिमानी से समाधान खोजने में दिन, हफ्ते या महीने लग सकते हैं। लेकिन मुक्का तत्काल है। चिल्लाना तत्काल है। इसलिए ताकत आकर्षक लगती है।
यह मानसिकता व्यक्तिगत और सामूहिक दोनों स्तरों पर घातक है। व्यक्तिगत रूप से, यह लोगों को आवेगी और हिंसक बनाती है। सामूहिक रूप से, यह समाज को भीड़तंत्र में बदल देती है।
संस्कृति की विस्मृति
भारतीय संस्कृति में बुद्धि को हमेशा सर्वोच्च माना गया है। महाभारत में भीम की ताकत अद्वितीय थी, लेकिन युद्ध जीतने वाली योजना कृष्ण की थी। रामायण में हनुमान की शक्ति असीम थी, लेकिन राम की विजय उनके धैर्य और रणनीति से हुई।

चाणक्य ने कभी तलवार नहीं उठाई, फिर भी उन्होंने एक साम्राज्य खड़ा किया। अकबर ने अपनी सैन्य शक्ति से भी अधिक अपनी राजनीतिक सूझबूझ से राज किया। गांधी ने बिना हिंसा के दुनिया की सबसे बड़ी साम्राज्यवादी शक्ति को झुका दिया।
लेकिन आज हम इन सभी उदाहरणों को भूल गए हैं। हम अपने बच्चों को बाहुबली और रॉकी भाई की कहानियाँ सुनाते हैं, चाणक्य और गांधी की नहीं।
परिणाम: एक हिंसक समाज
इस सब का परिणाम हमारे सामने है। सड़क पर गाड़ी चलाने वाले एक-दूसरे को जान से मारने पर उतारू रहते हैं। छोटी-छोटी बातों पर झगड़े होते हैं जो हत्याओं में बदल जाते हैं। सोशल मीडिया पर राय का मतलब गालियों की बौछार है।
भीड़तंत्र बढ़ रहा है। अफवाहों पर लोग निर्दोषों को पीट देते हैं। कोई सबूत नहीं, कोई जाँच नहीं – बस आरोप और सजा।
यह केवल कानून व्यवस्था की समस्या नहीं है, यह हमारी सोच की समस्या है। जब ताकत को सम्मान मिलता है और बुद्धि को कमजोरी माना जाता है, तो समाज पतन की ओर जाता है।
समाधान: बुद्धि को पुनर्स्थापित करना
इस समस्या का समाधान सरल नहीं है, लेकिन असंभव भी नहीं। हमें सचेत प्रयास करने होंगे:
व्यक्तिगत स्तर पर:
- अपनी प्रतिक्रियाओं पर नियंत्रण रखें। गुस्से में तत्काल जवाब देने की बजाय, एक पल सोचें।
- पढ़ने की आदत विकसित करें। न केवल सोशल मीडिया पोस्ट, बल्कि किताबें और गहन लेख।
- हिंसक और आक्रामक सामग्री को प्रोत्साहन न दें। उसे लाइक, शेयर या कमेंट न करें।
पारिवारिक स्तर पर:
- बच्चों को बुद्धिमत्ता के उदाहरण दिखाएँ। उन्हें बताएँ कि असली नायक कौन हैं।
- उन्हें सिखाएँ कि हर समस्या का समाधान हिंसा नहीं है।
- फिल्में देखते समय उनके साथ चर्चा करें कि क्या सही है और क्या गलत।
सामाजिक स्तर पर:
- बुद्धिमत्ता को सेलिब्रेट करें। उन लोगों को प्रोत्साहित करें जो सोच-समझकर काम करते हैं।
- शिक्षा प्रणाली में सुधार की माँग करें। रटने की बजाय सोचने पर जोर दें।
- मीडिया से जिम्मेदारी की माँग करें। हिंसा को ग्लैमराइज करने वाली सामग्री का विरोध करें।
अंतिम विचार
इतिहास गवाह है कि जिन सभ्यताओं ने ताकत को बुद्धि से ऊपर रखा, वे अंततः नष्ट हो गईं। रोमन साम्राज्य, मंगोल साम्राज्य – सभी अपनी सैन्य शक्ति के बावजूद धूल में मिल गए।
भारत के पास एक समृद्ध बौद्धिक परंपरा है। हम वेदों, उपनिषदों और महान विचारकों की भूमि हैं। लेकिन अगर हम यह सब भूलकर केवल मांसपेशियों की पूजा करने लगें, तो हम अपनी असली पहचान खो देंगे।
2025 में हमें यह तय करना है कि हम किस तरह का समाज बनाना चाहते हैं। एक ऐसा समाज जो चिल्लाता है, मारता है और नष्ट करता है? या एक ऐसा समाज जो सोचता है, समझता है और निर्माण करता है?
चुनाव हमारा है। और यह चुनाव हमारे भविष्य को निर्धारित करेगा।
याद रखें: असली ताकत दिमाग में होती है, मांसपेशियों में नहीं। बुद्धि कभी हारती नहीं, भले ही बल अस्थायी रूप से जीत जाए।

Whatever you have written is very correct. I agree with your thinking. I really enjoyed reading it.